उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक पटल पर हमेशा चर्चा में रहने वाले आजमगढ़ जिले से एक बेहद चौंकाने वाली और प्रेरणादायक रिपोर्ट सामने आई है। देश में निर्वाचन आयोग और प्रशासनिक स्तर पर चलाई जा रही विशेष मतदाता पुनरीक्षण और सुदृढ़ीकरण (SIR) प्रक्रिया को लेकर जहां विपक्षी दल अक्सर कई तरह के मनगढ़ंत सवाल खड़े करते रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत ने तमाम अफवाहों का मुंहतोड़ जवाब दे दिया है। आजमगढ़ के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में इस प्रक्रिया को लेकर जैसी अभूतपूर्व जागरूकता और सक्रियता देखने को मिली है, वह वाकई मिसाल बन गई है। सरकारी आंकड़ों और विधानसभा-वार सामने आई रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि मुस्लिम समाज ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति अत्यधिक सजगता दिखाते हुए इस अभियान में दिल खोलकर और बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है।
मुबारकपुर से निजामाबाद तक हर कोने में छाई जागरूकता की लहर
आजमगढ़ जनपद की कुल दस विधानसभा सीटों में से नौ सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या में शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो इस बात का सीधा प्रमाण है कि आम जनता प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर कितनी गंभीर है। निर्वाचन आंकड़ों के अनुसार, जनपद के सबसे संवेदनशील और चर्चित माने जाने वाले मुबारकपुर विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक 2.50 प्रतिशत की भारी-भरकम बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके अलावा निजामाबाद में 1.28 प्रतिशत, दीदारगंज में 1.26 प्रतिशत, फूलपुर-पवई में 1.09 प्रतिशत और लालगंज में 0.92 प्रतिशत की ठोस वृद्धि देखने को मिली है। इसके साथ ही गोपालपुर, सगड़ी, मेहनगर और मधुबन विधानसभा सीटों पर भी मुस्लिम मतदाताओं के ग्राफ में सकारात्मक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। केवल एक आजमगढ़ सदर सीट को छोड़कर जहां मामूली 0.30 प्रतिशत की आंशिक कमी आई है, बाकी पूरे जिले में मुस्लिम मतदाताओं की भागीदारी ने इतिहास रच दिया है।
अफवाहों पर लगा विराम, चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर लगी मुहर
पिछले कुछ समय से कुछ राजनीतिक दलों द्वारा यह दुष्प्रचार किया जा रहा था कि इस तरह की प्रशासनिक प्रक्रियाओं के जरिए विशेष समुदाय के लोगों के नाम सूची से बड़े पैमाने पर काटे जा रहे हैं। लेकिन आजमगढ़ के इन आधिकारिक आंकड़ों ने उन तमाम भ्रामक दावों की हवा निकाल दी है। जिले की 90 प्रतिशत विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं के आंकड़े बढ़ने से यह साफ हो गया है कि चुनाव आयोग की पूरी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और न्यायसंगत है। जिन लोगों ने बिना किसी तथ्यात्मक प्रमाण के लोकतांत्रिक संस्थाओं और आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने की कोशिश की थी, उन्हें इन आंकड़ों ने आईना दिखा दिया है। यह इस बात का सबूत है कि सरकार और प्रशासन पूरी ईमानदारी से नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर रहे हैं, बशर्ते जनता खुद जागरूक होकर आगे आए।
हिंदू समाज क्यों रह गया पीछे?
एक तरफ जहां मुस्लिम समाज ने पूरी मुस्तैदी और चौकेस रहकर अपने नाम मतदाता सूची में दर्ज करवाए और अपडेट कराए, वहीं दूसरी तरफ हिंदू समाज का इस प्रक्रिया में पिछड़ना कई सवाल खड़े करता है। स्थानीय स्तर पर की गई समीक्षा से पता चलता है कि हिंदू आबादी के बीच इस महत्वपूर्ण अभियान को लेकर कहीं न कहीं उदासीनता और लापवाही का माहौल रहा। कई जगहों पर लोगों ने बूथ स्तर पर जाकर सूची में नाम चेक करने या नया नाम जुड़वाने में वह सक्रियता नहीं दिखाई जो आवश्यक थी। लोकतंत्र में हर एक वोट देश की दिशा तय करता है, लेकिन ऐसी महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया में एक बड़े वर्ग का पीछे रह जाना यह दर्शाता है कि आम जनता के बीच प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर और अधिक जागरूकता फैलाने की सख्त जरूरत है।
हिंदू समाज क्यों रह गया पीछे?
एक तरफ जहां मुस्लिम समाज ने पूरी मुस्तैदी और चौकेस रहकर अपने नाम मतदाता सूची में दर्ज करवाए और अपडेट कराए, वहीं दूसरी तरफ हिंदू समाज का इस प्रक्रिया में पिछड़ना कई सवाल खड़े करता है। स्थानीय स्तर पर की गई समीक्षा से पता चलता है कि हिंदू आबादी के बीच इस महत्वपूर्ण अभियान को लेकर कहीं न कहीं उदासीनता का माहौल रहा। कई जगहों पर लोगों ने बूथ स्तर पर जाकर सूची में नाम चेक करने या नया नाम जुड़वाने में वह सक्रियता नहीं दिखाई जो आवश्यक थी। लोकतंत्र में हर एक वोट देश की दिशा तय करता है, लेकिन ऐसी महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया में एक बड़े वर्ग का पीछे रह जाना यह दर्शाता है कि आम जनता के बीच प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर और अधिक जागरूकता फैलाने की सख्त जरूरत है।
तथ्यों और आंकड़ों से समझें लोकतंत्र की असली तस्वीर
आजमगढ़ के इन पुख्ता आंकड़ों ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा हवा-हवाई बयानों के आधार पर नहीं, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों और ठोस प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए। निर्वाचन आयोग द्वारा समय-समय पर चलाई जाने वाली ऐसी प्रक्रियाएं देश की लोकतांत्रिक नींव को और अधिक मजबूत करती हैं। जब मतदाता खुद आगे बढ़कर सूची में अपना नाम दुरुस्त करवाते हैं और अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, तभी एक सशक्त और वाइब्रेंट लोकतंत्र का निर्माण होता है। आजमगढ़ के जागरूक नागरिकों, खासकर मुस्लिम समाज के लोगों ने यह दिखा दिया है कि देश के विकास और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में कैसे बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी निभाई जाती है। यह पूरी रिपोर्ट देश के अन्य जिलों के लिए भी एक बड़ा सबक और प्रेरणा का स्त्रोत है, जो यह सिखाती है कि सजगता ही नागरिक का सबसे बड़ा हथियार है।
