आजमगढ़ महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय में शनिवार 18 अप्रैल को अघोरपीठ क्रीं कुण्ड वाराणसी के सहयोग से ‘अघोरदर्शन: शिक्षा में समरसता और मानवीय मूल्यों की स्थापना’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि अघोराचार्य बाबा सिद्धार्थ गौतम राम ने कहा कि अघोरदर्शन और शिक्षा दोनों का मूल उद्देश्य मानवमात्र का कल्याण है, शिक्षक और शिक्षार्थी इसके संवाहक हैं।कुलपति प्रो. संजीव कुमार ने पीठाधीश्वर का स्वागत करते हुए कहा, “वर्तमान शिक्षा प्रणाली में संतों की वाणी और अघोरदर्शन के सर्वजन कल्याण के नैतिक सिद्धांतों का समावेश किया जाए तो सभ्य, सुरक्षित और नैतिक समाज व राष्ट्र की रचना का उद्देश्य पूरा हो सकता है।अघोराचार्य बाबा सिद्धार्थ गौतम राम ने आशीर्वचन में कहा कि शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि मानव विवेक को जागृत कर नैतिकता, परस्पर प्रेम और मानव कल्याण के रास्ते पर चलना है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन निरन्तर अन्य विश्वविद्यालयों में भी होने चाहिए।क्रीड़ा सचिव प्रो. प्रशान्त कुमार राय ने कहा कि अघोर का अर्थ सहज और सरल है। अघोर, सहज, सरल नैतिक मनुष्य बनकर ही समाज व राष्ट्र को विकसित बना सकते हैं। इसके लिए अघोरदर्शन के मूल्यों को शिक्षा से जोड़ना होगा। बीएचयू के डॉ. विकास सिंह ने अघोर परम्परा के इतिहास पर प्रकाश डाला। डॉ. विनय कुमार शुक्ल ने अघोर परंपरा पर शोध की जरूरत बताई। गोरखपुर के डॉ. रूप कुमार बनर्जी ने सामाजिक बुराइयों के अंत के लिए अघोर के सिद्धांत अपनाने पर जोर दिया। कुलसचिव डॉ. अन्जनी मिश्रा ने सभी के प्रति आभार जताते हुए भविष्य में भी ऐसे आयोजनों के लिए विश्वविद्यालय के सहयोग का आश्वासन दिया। संगोष्ठी समन्वयक लेफ्टिनेंट डॉ. पंकज सिंह ने बताया कि कुलपति की प्रेरणा व पीठाधीश्वर की अनुमति से मंदिर प्रांगण में सुन्दरकाण्ड पाठ, शिवलिंग पूजन व संगोष्ठी का सफल आयोजन हुआ। संगोष्ठी का संचालन डॉ. दीपिका अग्रवाल व डॉ. पंकज सिंह ने किया। इस दौरान वित्ताधिकारी जगमोहन झा, परीक्षा नियंत्रक आनन्द मौर्य, मीडिया प्रभारी डॉ. प्रवेश सिंह सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, छात्र-छात्राएं व अघोरपीठ के अनुयायी बड़ी संख्या में मौजूद रहे।
